शुभकामनाएं..सर्वे सन्तु निरामयाः

कल पृथ्वी
दिवस_था

पृथ्वी का प्रेमांश हैं बेटियां
धरती की मुस्कान हैं बेटियां
प्रभु ने बनाई होंगी बेटियां
कि..... कि पृथ्वी घूमती रहे अनवरत
जिससे खिलखिलाती रहें जिंदगियां
बदलती रहें ऋतुएं
होते रहें दिन और रात
सजती रहे नित नए रंगों की सौगात

पृथ्वी के ही अंश के रूप में
प्रभु ने सिरजी हैं बेटियां
ताकि उनके स्मित आकर्षण में
बनी रहे पृथ्वी की गति लगातार
जीवन होता रहे साकार......
इस तरह
एक नाजुक सा अवलम्ब हैं बेटियां
पृथ्वी की घूर्णन.... परिक्रमण की

पृथ्वी का स्वरूप हैं बेटियां
इसीलिए
उसने घूमने से नहीं किया इनकार कभी
इसीलिए नभ बरसाता है मेघ
इसीलिए सरसते हैं खेत
इसीलिए पेड़ पौधों में पल्लवन है
इसीलिए नदियों उद्गमन है
और बेटियां के होने से ही
मुस्कराती माएं हैं
गर्वित पिता हैं , स्नेहिल भाई हैं
वज्र से पौरुष में पुष्प की नरमाई है
समाज में आकांक्षाओं का दीया
और सम्पूर्ण सृष्टि में सौन्दर्य की ललाई है....

हम ऐसे दौर में जी रहे हैं शायद
जहाँ हम ध्यान नहीं रखते
भूख से दम तोड़तीं बेटियां का
चारों ओर से आहत पृथ्वी के घावों का

बारह साल की बच्ची
अपनी जिजीविषा से दौड़ती रही
और घर के निकट आते-आते
समा गई काल के गाल में
अन्न के कुछ दानों के अभाव में.....
मैं विस्मित हूँ
करोड़ो वर्षों से जाने कैसे घूम रही है पृथ्वी
ऐसे दृश्यों को बार-बार देखकर भी
अपने अंश का देखकर ध्वंश भी.....

चिंतित भी हूँ मैं
पृथ्वी कभी भी कर सकती है इनकार
घूमने से
जाने कौनसी बेटी की चीत्कार
उसे अपने गन्तव्य से कुछ मील पहले ही
रुक जाने को बाध्य कर दे.........!!
रमेश कुमार टेलर
आचार्य आदर्श विद्या मंदिर माध्यमिक विद्यालय आहोर
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